Om Sai Ram
Om Sai Ram
Thursday, September 20, 2012
Friday, August 10, 2012
Tuesday, February 14, 2012
Sunday, January 22, 2012
Tuesday, August 24, 2010
अतीत के झरोखें........

दिन के उजाले में कही शाम नज़र आयी है
सहरों-शाम अब तू ही तू हर खासो-आम नज़र आयी है
ये हवा आज इतनी मदमस्त क्यों बह रही है ?
लगता है आज फिर ये तेरा कोई पैगाम ले के आयी है
वो नादाँ है जो इश्क का दर्द नही समझते ...
कभी डूब के देख माशूक कि मस्त निगाहों में
है इश्क तेरा सच्चा तो
वहीँ काशी कि गंगा और काबा कि खुदाई है ............
तरुण
Monday, August 23, 2010
फिर इक अदद शाम कि तलाश है मुझे ............

क्यूँ मेरी जिंदगी में अब शाम नही आती है ?
वो शाम जो बचपन में कई सपने ले के आती थी
वो शाम जिसमें खेलों के मैदान जवां होते थे ,
वो शाम जिसमें हम पतंग कि पेंचो में उलझ जाते थे
वो शाम जब हम सारे बंधनों से जुदा हो जाते थे
वो हंसी वो ठहाके वो दोस्तों कि शिरकत ,
वो शाम जिसमें हम जिंदगी खुद जिया करते थे
वो शाम अब क्यों नही आती है ?
क्यों अब सुबह के बाद सीधे रात हो जाती है ?
दोस्त तो अब भी हैं मगर अब वो हँसते नही
क्यों अब हँसने के लिए T.V कि मदद ली जाती है ?
इक दिन यूँ ही बैठा अपने दिल से सवालात किया
क्यों बोझिल है तू ,क्या कुछ नही है मुझपे ?
गाड़ी है बंगला है और शानोशौकत है
बता ख्वाहिश है क्या तेरी , किस चीज कि आस है तुझे ?
जवाब- ऐ –दिल था कि इक अदद शाम कि तलाश है मुझे
जो तेरी जिंदगी में अब नही आती है ................
आपका अपना
तरुण
Subscribe to:
Posts (Atom)








