Om Sai Ram

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Tuesday, February 14, 2012

कारवाँ


मत दे मुझे शहंशाही ऐ मेरे मालिक ,
करम इतना कर कि ताउम्र गैरों के लिए दुआ निकले |
जिंदगी जैसी भी तू देगा कुबूल है मुझे ,
पर मौत ऐसी हो कि जहाँ रोये , जब मेरे जनाजे का कारवाँ निकले |


~ तरुण तिवारी

Tuesday, August 24, 2010

अतीत के झरोखें........


दिन के उजाले में कही शाम नज़र आयी है

सहरों-शाम अब तू ही तू हर खासो-आम नज़र आयी है

ये हवा आज इतनी मदमस्त क्यों बह रही है ?

लगता है आज फिर ये तेरा कोई पैगाम ले के आयी है


वो नादाँ है जो इश्क का दर्द नही समझते ...

कभी डूब के देख माशूक कि मस्त निगाहों में

है इश्क तेरा सच्चा तो

वहीँ काशी कि गंगा और काबा कि खुदाई है ............
तरुण

Monday, August 23, 2010

फिर इक अदद शाम कि तलाश है मुझे ............


क्यूँ मेरी जिंदगी में अब शाम नही आती है ?
वो शाम जो बचपन में कई सपने ले के आती थी
वो शाम जिसमें खेलों के मैदान जवां होते थे ,
वो शाम जिसमें हम पतंग कि पेंचो में उलझ जाते थे

वो शाम जब हम सारे बंधनों से जुदा हो जाते थे
वो हंसी वो ठहाके वो दोस्तों कि शिरकत ,
वो शाम जिसमें हम जिंदगी खुद जिया करते थे
वो शाम अब क्यों नही आती है ?

क्यों अब सुबह के बाद सीधे रात हो जाती है ?
दोस्त तो अब भी हैं मगर अब वो हँसते नही
क्यों अब हँसने के लिए T.V कि मदद ली जाती है ?
इक दिन यूँ ही बैठा अपने दिल से सवालात किया

क्यों बोझिल है तू ,क्या कुछ नही है मुझपे ?
गाड़ी है बंगला है और शानोशौकत है
बता ख्वाहिश है क्या तेरी , किस चीज कि आस है तुझे ?

जवाब- ऐ –दिल था कि इक अदद शाम कि तलाश है मुझे
जो तेरी जिंदगी में अब नही आती है ................


आपका अपना
तरुण

Friday, August 20, 2010

खुशियों से भरी इस महफ़िल में


खुशियों से भरी इस महफ़िल में इंसान कितना तन्हा है ,
ये सोचता हू तो डरता हू कि ईमान कितना हल्का है
दुश्मन है दोस्त कभी ,दोस्त कभी दुश्मन है
चल रहा हू मै कहा ,कहा मेरी मंजिल है


कैसे लडूं इन तन्हाईयों से , कसे करू खुद पे यकी
है दर्द मेरे दिल में फिर भी चेहरे पे हँसी
ढूंढता हू उन बाँहों को , उन आँखों को लाखों में
जो सम्हाले मुझ को और देखे मुझको मुझमे कही


औरों कि नजर में मुझमे ना कही कोई कमी
पर जब देखता हूँ आईना तो मुझमे कही कुछ दिखता ही नही
इन आँखों में इक आस और मन में विश्वास लिए चलता हू
खोज में अपनी मंजिल कि खुद में मैं रोज जलता हू


खुद को जलाकर रौशनी से इस वीरानगी को हटाऊंगा मैं
जीत लिया अगर खुद को तो दुनिया को जीत जाऊंगा मैं
भ्रष्टाचार के इस युग में अभी प्यार कितना नन्हा है
खुशियों से भरी इस महफ़िल में इंसान कितना तन्हा है

Thursday, August 19, 2010

भोजपुरिया खाली गरमटिया नईखे रह गईल अब


जय हिंद मित्रों

अभी कुछ दिन पाहिले हम चंडीगढ़ में अपना बेटी के इलाज करावे के दौरान हम जब एगो ऑटो में बैठ के जात रहनी तबे अपना आदत अनुसार ऑटो वाले से पूछनी कि “ भईया कहा के हो ?” तब उ कहलस कि “यु पी “ तब हम फेरु ओहसे पूछनी कि “ भई यु पी में कहा के त उ का जवाब देत बन् कि “ बनारस के पास के “...चुकीं हमार पैदाइश बनारस के बा त ओकर नाम सुनके मन में और उत्सुकता बढल और फिर ओहसे सवाल दुहरा के पूछनी कि “ बनारस के पास कहा ? “ तब उ बतावने कि “सासाराम” ....


हम उनसे कहनी कि “भईया सासाराम त बिहार में बा और तू यु पी बतावत बड , कहे हो ? का बिहार एहिजा केहू न जाने ला का ?” तब उ जून उत्तर देहां जून सुन के आत्मग्लानी भी भईल और दुःख भी . उ कहने कि “ भईया तू उहवा के हौव त तोहके अच्छा लागत बा लेकिन एहिजा केहू अच्छा ना मानेला ओहर के लोगन के “ बड़ा दुख भईल कि हमनी के कहा से कहा पहुच गईनी सभे लेकिन हमनिये के कुछ भाई अबहू आपन गांव जवार के छोड़ के बाहर जा के काम करता खाली दू जून के रोटी खातिर और आपन घर बतावे में भी लजाता ............


भोजपुरिया समाज के अगर छोड दिहल जाय ता जाबो कही दू परानी एके जगह और भाषा के भेंटाने त अपनी भाषा में बतियावे ले ..अबहियों कही न कही एगो कसक बा हमनी के समाज में कि हमनी का अपने भाषा में बतियावे में लजानी जा.

अगर आज भोजपुरिया समाज के ऐ दशा बा त ओकर जिम्मेवार भी हमनी के बानी जा ...आज भोजपुरिया समाज के नौनिहाल कहवा नइखे स? हर बड कंपनी में हर सम्माननीय समाज में भोजपुरिया समाज के लोग बा लेकिन उ लोग आपन समाज, जहवा से उहा पहुचल बा छोड़े के बाद ओकर उपेक्षा करत बा , आपन लोग से अपने भाषा में न बोल के उधार में लिहल भाषा में बतियावत बा ताकि उनकर पोजीसन न खराब हो जाय ....आखिर काहे?

जब एगो बेटा आपन माई के सम्मान न करी त दूसर भला ओकर सम्मान कैसे करी? हमनी का नौकरी खातिर बाहर जात बानी जा त का आपन माटी के भुला जाईल जाई?हमनी का आपन लईका बच्चा के कान्वेंट में भेज के अंग्रेजी त सिखा सकेनी लेकिन उनकरा के आपन मातृभाषा के सिखाई जबले हमनी का न पहल करेब? और जब उ लईका कबहूँ अपने गावें जाई त का विचार आयी ओकरा मन में?

आज हमनी के जरुरत बा कि जे सक्छम बा ओह्के पहल करे के अपना गांव जवार के भाई लोगन के मार्ग दर्शन के कहे के देश त बहुत तरक्की कर लिहलस लेकि ऐ हमार दुर्भाग्य बा कि अभियो पूर्वांचल ,बिहार और झारखंड के बहुत अइसन जगह बा जौअन २० साल पीछे बा दुनिया से....कबले हमनी का एह आस में बईठल जाई कि नेता जी अयिहें और कुछो करिहें.....

इ त दुर्भाग्य बा भोजपुरिया समाज के ओह्के खाली लूटे खसोटे वाला नेतृत्व हे मिलल आज तक ले नहीं त कबो सोन चिरैया कहे जय वाला हिंदुस्तान के असली दिल त एहिजे धडकत रहे ......आजो झारखण्ड से जेतना कोयला निकलेला ओतना कही से नहीं से नहीं लेकिन उ कोयला निकले ले त झारखण्ड से लेकिन ओहसे उजाला कही और होखेला एहिजा रह जाला त खाली कालिख ........भारत के प्रशासनिक सेवा में सबसे जादा चयन बिहार से होखेला लेकि शर्म त तब आवेला जब दक्छिन भारत में इहवा से मेडिकल और इंजिनीरिंग पड़े गईल लईका के खाली इ वजह से मार दिहल जाला कि उ बिहारी बा और हमार कथित प्रशासनिक अधिकारी लोग मुह में अंगूरी डाल के तमाशा देखेला .

जबले आम आदमी जे शिक्छित बा उ आगे न आयी सही मायने में भोजपुरी के सम्मान न मिली . जबले हमनी का इ विश्वास न दिला लिहल जाई कि ३००० रुपया खातिर आपन बाल बच्चा घर बार छोड के कही जा के रेक्सा चलावाला के जरुरत नहिखे रह गईल इहवा के आदमी जन के तब ले सही मायने में भोजपुरी के सम्मान न मिली .

काहे ना हमनी के यहा कौनो बहुराष्ट्रीय कंपनी आपन फैक्ट्री लगावत बा ? काहे हमनी के भाई लोगन के इतना पढ़े के बाद दिल्ली और बैंगलोर में जा के नौकरी खोजे के पड़ता?

भोजपुरी के सम्मान सही मायने में तब मिली जब बैंगलोर क लईका बिहार /झारखण्ड आ के नौकरी खोजिहे ...................................ई तबे होई जब हमनी का जगल जाई और अगल बगल के लोगन के जगावल जाई .अपने ज्ञान का इस्तेमाल अपने गांव जवार के विकास खातिर करल जाई....अब मज़बूरी में जिए वाला दिन नईखे .....अब त मजबूर करे के बा ओह्के जे हमनी के माई के अस्मत बेंच के आपन जेब भरता ................


आपका अपना

तरुण तिवारी

Wednesday, August 18, 2010

सोन चिरैया

देख के ई नग्न नाच सभी केहू हताश बा
युग परिवर्तन होवे के अबहू तनीक कयास बा
अंतर्द्वंध से मन विचलित बा ,अब करे के कुछ प्रयास बा
हाथ मिला के चला ए भईया , सोन चिरैया आयी फेर से मन में ई विश्वास बा.